क्राइम इंडिया संवाददाता नज़ीम अशरफ़। दिल्ली पुलिस ने एक 25 साल पहले हुए कत्ल के मामले को सुलझा लिया है। 25 साल पहले दिल्ली के ओखला में एक शख्स की चाकूओं से गोदकर हत्या कर दी गई थी लेकिन हत्यारा पकड़ में नहीं आया था। लंबे समय तक पुलिस कातिल को पड़ने की कोशिश करती रही लेकिन कामयाबी नहीं मिली थी। अब आखिरकार कातिल पुलिस की गिरफ्त में है। क्या है पूरा मामला चलिए जानते हैं।एक शख्स जिसने दिल्ली की रहने वाली सुनीता से छीन लिया उनका सुहाग, जिसने छीन ली उनकी ज़िंदगी की सारी खुशियां, जिसने एक परिवार की ज़िंदगी में तूफान खड़ा कर दिया। 25 साल बाद जब वो शख्स सुनीता के सामने आया तो उनकी आंखों के सामने घूमने लगे वो पिछले दर्दनाक 25 साल। कैसे एक शख्स ने उसकी हंसती-खेलती दुनिया हमेशा के लिए वीरान कर दी। जैसे ही ये गुनहागार सुनीता के सामने आया वो पहचान गईं कि यही है वो खौफनाक चेहरा जिसने 25 साल पहले उनके सुहाग को उजाड़ा और उन्हें विधवा बनाया। वो काफी देर तक उसे देखती रहीं। दर्द, खौफ नफरत, घृणा वो हर इमोशन सुनीता की आंखों में थे जो एक पत्नी के अपने पति के कातिल के लिए होने चाहिए। अपने कातिल को सामने देखकर वो संभल नहीं पाई और फिर बेहोश हो गई। ये माजरा लखनऊ में दो दिन पहले का है लेकिन ये कहानी की शुरुआत होती है साल 1997 में देश की राजधानी दिल्ली से, यानी आज से करीब 25 साल पहले। दिल्ली के ओखला में सुनीता अपने पति किशनलाल और बच्चों के साथ किराए के मकान में रहती थीं। एक दिन अचानक किशनलाल की हत्या की खबर आती है। किशन लाल की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी जाती है। उसके शरीर पर जगह जगह पर चाकुओं के वार के निशान पाए जाते हैं। ये साफ था कि किशनलाल की हत्या हुई है लेकिन सवाल ये था कि ये हत्या किसने की और क्यों? आखिर कौन था किशनलाल का दुश्मन जिसने उसे मौत के घाट उतार दिया। ओखला थाने में हत्या का मामला दर्ज होता है। मर्डर केस की जांच पड़ताल शुरू होती है। पुलिस तमाम तरह से इस केस को खंगालती है। सुनीता को शक है कि उसके पति किशनलाल की हत्या के पीछे किशनलाल का एक दोस्त रामू है। पुलिस तफ्तीश करती है, रामू को पकड़ने की कोशिश होती है। उसके खिलाफ सबूत जुटाए जाते हैं लेकिन रामू का कोई पता नहीं चलता। तमाम जगहों पर रामू की तलाश की जाती है लेकिन रामू पुलिस की पकड़ में नहीं आता। कोर्ट मेंं मामला जाता है लेकिन पुलिस रामू को पेश नहीं कर पाती। रामू कहीं फरार हो जाता है। और फिर आखिरकार जब तमाम कोशिश के बावजूद रामू नहीं मिल पाता तो फिर रामू को भगोड़ा अपराधी घोषित किया जाता है। Delhi Police ने बिछाया जाल
कुछ साल तक पुलिस रामू को पकड़ने की कोशिश करती है। सुनीता अक्सर अपने पति की कातिल की तलाश के लिए पुलिस स्टेशन जाती है लेकिन धीरे धीरे बात पुरानी होने लगती है। ऐसा लगता है कि शायद अब कभी किशनलाल का हत्यारा कानून के हत्थे नहीं चढ़ पाएगा। किशनलाल के बच्चे भी बढ़े हो जाते हैं और वक्त के साथ सुनीता भी अपने पति के कातिल को सजा दिलाने की आस छोड़ देती है लेकिन 25 साल बाद अचानक दिल्ली पुलिस इस केस को सुलझा लेती है। और किशनलाल का हत्यारा पुलिस की गिरफ्त में आ जाता है। तो चलिए जानते हैं कैसे ये पूरा मामला पुलिस बेहद सूझबूझ के साथ निपटाती है। पूरी तरह से ठंडे पड़े इस मर्डर केस में दिल्ली पुलिस सबसे पहले किशनलाल की पत्नी सुनीता तक पहुंचती है। दरअसल केस इतना पुराना हो चुका था कि इसके जांच अधिकारी अब बदल चुके थे इसलिए पुलिस को सबकुछ नए सिरे से जुटाना था। पुलिस सुनीता से इस मामले में मदद लेती है। सुनीता पुलिस को रामू के बारे कुछ क्लू देती है। सुनीता बताती है कि रामू के भाई की पत्नी दिल्ली के तुगलगाबाद में रहती है। पुलिस उस महिला तक पहुंचती तो पता चलता है कि अभी कुछ समय पहले ही रामू की मां की सड़क दुर्घटना में मौत हुई है। पुलिस इस बात को अपनी जांच के हिस्से में शामिल करती है और फिर एक ट्रैप फैलाया जाता है पच्चीस साल पुराने इस कातिल को ढूंढने के लिए। Murderer ने बदल लिया था नाम.
पुलिस बीमा अधिकारी बनकर रामू के भाई से मिलती है। उन्हें बताया जाता है कि क्योंकि रामू की मां की मौत सड़क दुर्घटना में हुई है इसलिए उन्हें इन्श्योरेंस का पैसा मिलेगा। पुलिस की एक टीम हेल्थ डिपार्टमेंट की टीम बनकर रामू के भाई से रामू और उसके पूरे परिवार की जानकारी निकालती है। रामू के भाई से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस रामू के बेटे को फेसबुक से ट्रैक करती है। उससे बात करने के बाद पता चलता है कि रामू एक ऑटो ड्राइवर है और उसने अपने नाम बदल लिया है। रामू ने अशोक यादव के नाम से अपनी नई पहचान बना ली है और लखनऊ में ऑटो चला रहा है। पुलिस लखनऊ के ऑटो वालों से मिलती है और फिर इस तरह जाल बिछाकर रामू को गिरफ्तार कर लिया जाता है। रामू पुलिस के सामने पुरानी सारी बातों इनकार करता है। वो ये मानने को कतई तैयार नहीं होता कि उसने कोई मर्डर किया है। पुलिस के पास ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था कि अशोक यादव को रामू साबित किया जाए। पुलिस किशनलाल की पत्नी को पहचान के लिए बुलाती है और फिर अशोक यादव को देखते ही वो पहचान जातीं है कि ये रामू ही है। सुनीता ने अपने पति का कत्ल होते हुए तो नहीं देखा था लेकिन वो ये जानती थी कि रामू उसके पति का दोस्त है और उन दोनों का अक्सर उठना बैठना होता था। पुलिस चश्मदीद यानी सुनीता की गवाही के आधार पर रामू को गिरफ्तार करती है और फिर पूछताछ में रामू अपना जुर्म कबूल कर लेता है। रामू बताता है की उसे पता चल गया था कि किशनलाल के पास कुछ पैसे हैं और उन्हीं पैसों को लेकर उसने किशन लाल को मौत के घाट उतार दिया। पच्चीस साल से खुली हवा में घूम रहा ये कातिल देर से ही सही आखिरकार पुलिस की गिरफ्त में आ ही जाता है। नार्थ दिल्ली के डीसीपी सागर सिंह कलसी बताते हैं कि इस केस में उनके पास कोई सबूत नहीं था लेकिन बावजूद इसके सिर्फ एक कातिल को पकड़ने के लिए जाल बिछाया गया जिसमें कातिल फंस गया। कलसी ने बताया कि पूरा केस शांत था। जांच अधिकारी भी बदल चुके थे लेकिन नई टीम ने बखूबी इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। एसीपी धर्मेन्द्र कुमार, इंस्पेक्टर सुरेन्द्र सिंह, सब इंस्पेक्टर योगेन्द्र, और हेड कॉन्सटेबल पुनीत और ओम प्रकाश की टीम ने इस मैनहंट को अंजाम तक पहुंचाया और आखिरकार सुनीता को इंसाफ दिलाया।
Edit By : M T RAHMAN











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